मेरी कविताएं

शब्दों का ताना-बाना

Author: maitreyinarsingh@gmail.com

  • स्वर्ण युग की गाथाएं

    स्वर्ण युग की गाथाएं,चन्द्र-समुद्र की गुप्त धाराएंविक्रमादित्य और कुमार-स्कन्द,गुप्त वंश के ये पांच महान मकरन्दप्रयाग प्रशस्ति,समुद्र की महासागर स्तुति,कर्तृपुर-नेपाल और कामरूप का विजेता,उत्तरापथ-दक्षिणापथ ने स्वीकारी अधीनता।कला-साहित्य और ज्ञान विज्ञान में उन्नत,संस्कृत पंक्ति का हुआ एक शब्द में प्रोन्नत,पृथ्वी की सूर्य-परिक्रमा,दाशमिक पद्धति का अनुप्रयोग,गूढ़ रहस्य बतलाते महान गणितज्ञ आर्यभट्ट।फाह्यान,एक चीनी बौद्ध भिक्षु,शांति का पाठ सीखने,भारत पहुँचा।लड़ाकू…

  • पाटलिपुत्र अब पुराना नगर

    पाटलिपुत्र अब पुराना नगर,कन्नौज इत्र का नगर,उत्तर भारत का केन्द्रिय नगर,हर्ष और ह्वेनसांग,एक सम्राट और दूसरा भिक्षु चारणदोनो ने किया बौद्ध धर्म का उच्चारण।समकालीन,पश्चिम में धर्म मुहम्मद,जेहाद का पहला प्रचारक,प्रयाग में धर्म संसद,मक्का के आगे पारसियों पर धर्म संकट।मक्का से मदीना,कन्नौज के प्रयाग,दो विपरित धर्म राज्यों का आरम्भ काल,भारत में राजपूत,फारस में खलीफा-राज।अग्नि-कुण्ड से उत्पन्न,चार…

  • वृक्ष छाल-पत्रों का संकलन—

    वृक्ष छाल-पत्रों का संकलन,पुष्प-पत्रों के रंग से अंकन,खग-पंख से लेखन,हुआ पाण्डुलिपियों का वंचन,वेदोपनिषद और पुराणों का संकलन,पाठशाला में शिष्यों का वाचन-मंचन,तक्षशिला से चला उच्च शिक्षा का अभियान,प्रबुद्ध भारत का युग महान,सोलह महाजनपदों का स्रोत-सूत्र,अंगुत्तर निकाय और भगवती सूत्र,मगध कोसल वत्स और अवन्तिकानवीन धर्म प्रवर्तकों का युगोत्थानबौधगया और मृगदावन से ज्ञनोत्थानकेन्द्रित ज्ञानकुंज,वर्धमान और सिद्धार्थ का प्रकाश…

  • समय के साथ—-

    समय के साथ,आगे बढ़ता मानव और सशक्त हुआ,गुहा की प्राचीर और छीनी-हथौड़ा,राजाज्ञा से गोदे गये अक्षर,राजनीतिक आचार-विचार,शिलाएं और स्तम्भ से हुआ प्रचार,स्थिर और टिकाऊ सूचना-सार,तेज हवा, अभितृप्त ताप की मार,मौसमी मेघ और जलवायु परिवर्तन का प्रहार,इतिहास के अज्ञानी युग पर अमिट लेखनी का हार,राजाज्ञा के संदेश,धम्म स्तम्भ, विकेन्द्रित ज्ञान तत्व,स्वतंत्र भारत का अभिमानी पुरातत्व।शिलाएं और…

  • एक समय था जब लेखनी हेतु-

    एक समय था जब लेखनी हेतु,पेड़-पौधे व पशु-पक्षी पर निर्भर थे,स्याही का रंग प्राकृतिक,आरंभिक समय में तो गुहा प्राचीर,पुस्तक के पृष्ठ हुआ करते थे,सब कुछ प्राकृतिक,मानव भी प्राकृतिक,गुहा के अंतस में उकेरी रेखायें,कुछ विशेष ज्यामितीय,पशु-पक्षी के आरेख,आखेट करना ही हम समझ पाये।समय का चक्र घूमता,सिंधु-सरस्वती की नगरीय सभ्यता,ग्रामीण परिवेश से निकली हड़प्पा की भभ्यता,चित्राकार लिपि…