एक समय था जब लेखनी हेतु,
पेड़-पौधे व पशु-पक्षी पर निर्भर थे,
स्याही का रंग प्राकृतिक,
आरंभिक समय में तो गुहा प्राचीर,
पुस्तक के पृष्ठ हुआ करते थे,
सब कुछ प्राकृतिक,
मानव भी प्राकृतिक,
गुहा के अंतस में उकेरी रेखायें,
कुछ विशेष ज्यामितीय,
पशु-पक्षी के आरेख,
आखेट करना ही हम समझ पाये।
समय का चक्र घूमता,
सिंधु-सरस्वती की नगरीय सभ्यता,
ग्रामीण परिवेश से निकली हड़प्पा की भभ्यता,
चित्राकार लिपि के अक्षर,
हमारे लिए अपठनीय चार सौ अक्षर,
मानव अब न रहा निरक्षर,
सरस्वती का प्रवाह तब था निझर,
मिट्टी की मुहरों पर लिखावट,
चित्रों की स्पष्ट बनावट,
पाशुपत योगेश्वर की सजावट,
हाथी, बाघ, गेंडा और भौंसा साथ बसावट,
मोहन जोदड़ो का महास्नानागार,
हड़प्पा के अन्नागार,
लोथल की गोदीबाड़ा,
और धौलवीरा का परकोटा।
नगर स्थापत्य के दो रूप,
पश्चिम में ऊँचा दुर्ग और पूर्व में नीचा नगर स्वरूप,
व्यवस्थित जल प्रबंधन,
कुओं-तालाब के अवशेष चिह्न,
हड़प्पा में गेहूँ-जौ की भूसी,
कालीबंगा में चना-मटर की भूमि
पक्की ईंटों की ढकीं नालियां,
कालीबंगा का अर्थ काले रंग की चूड़ियां
समकोण पर काटती चौड़े पथं,
प्रारंभिक सभ्यता का भारतीय इतिहास।
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