मेरी कविताएं

शब्दों का ताना-बाना

एक समय वो भी था

एक समय वो भी था,
जब बच्चों के लिए स्कूल न थे,
किशोर-बालक का बचपन,        
खेल-कूद, कथा-ऐंणों में गुजरता था।
खेल-कूद का मतलब क्रिकेट-हॉकी न था,
तब इलेक्ट्रॉनिक,
मोबाइल-कम्प्यूटर के खेल न थे,
बाघ-बकरी,
मुर्गा-झपट,
अड्डू-पिड्डू,
लुकाछिपी का खेल,
पट्टांगण,
खलिहान,
सीड़ीदार खेतों,
उड्यारों और औखलागारों में खेला करते थे।
तिमूल के रूख में पकड़ा-पकड़ो,
और सावन में झूला झूलते थे।
जब कॉमिक्स,
दूरदर्शन और कार्टून चैनल न थे,
किशोर-बालक,
गोलू-गंगनाथ,
हरू-सैम,
राजुला-मालुशाही,
घंघू रमैला और अजेण्डी देवता की कहानियां,
दादा-दादी के साथ बैठ सुना करते थे।
रात्रिभोज के बाद,
चूह्ले की ताप पर ऐंणों में बचपन खिलता था।
एक समय वो भी था,
जब बच्चों के लिए बाजारू फास्ट फूड न थे।
जब खाने को,
दो मिनट की मैगी,
चाउमिन, मोमो,
बर्गर-पिज्जा न थे,
किशोर-बालक,
खज्जी चावल,
नमकीन-मीठी साई,
पिनालू-गीठे के गुटके,
नींबू का सन्ना,
ककड़ी के चीरे,
तिमूल का कट्टू,
काफल-हिसालू,
किड़मोड़ा-मेहुल,
और बेर-बेल खाया करते थे।

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