मेरी कविताएं

शब्दों का ताना-बाना

बूँद-बूँद जल

बूँद-बूँद जल,
पर्वतों से फूटता,
पत्थरों से छितरता,
गधेरों को पकड़,
लघु धाराओं जाल मकड़,
असंख्य धाराओं को एक दिशा में मोड़,
लघु सरिता में रूपान्तरित होने की होड़
घाटियों में नदी तल को रगड़ती,
विक्टरी चिह्नाकृति बनाती,
माटि-कंकड़ संग मैला आँचल,
दो पाटों मध्य बहता शीतल जल।
बूँद-बूँद जल,
अभ्र से फूटता-छितरता,
नभ से धरा-नेत्रों में उतरता,
ढलान पथ को पकड़,
अंत में नदी से जकड़,
मैदानों की गजगामिनी,
सर्पिल चिह्नाकृति बनाती,
अवशिष्टों को नित किनारे छोड़,
जलोढ़-बांगड़ का चापाकार मोड़,
समतल की सरिता,
प्रयागों की विशाल धारिता,
समुद्र तट पर पुनः धाराओं में बिखरती,
डेल्टा चिह्नाकृति बनाती,
जलधि में स्वयं लेती महान समाधि,
जैसे आत्मा-परमात्मा की अतृप्त सुधि।

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