मेरी कविताएं

शब्दों का ताना-बाना

प्रसन्नता के निर्भय बालपन में-

प्रसन्नता के निर्भय बालपन में-
झरने जैसा बहता क्षणिक ठहरता,
हवाओं जैसा बहता क्षणिक ठहरता
अंतस में केवल एक नन्हा संसार,
जीवन पुहुप का एक सुन्दर प्रकार
लघु अंग चलाने को सश्रम प्रयत्न,
जीवन रंग में घुलने को अथक यत्न,
झरने को आतुर जैसे पुहुप पुमंग,
तितलियों के संग उड़ने की उमंग।
चंचल सुकुमार के किशोरपन में-
अपने बारे में कुछ समझने-सोचने लगा,
क्या भला क्या बुरा मुझे समझाया गया,
तन-मन मेरा उलझनों में सिंहरने लगा,
वो या ये करू अंतस में होने द्वंद्व लगा,
चितावेश अपनी परिसीमा को स्पर्श करता,
उत्साह से ओत-प्रोत मन नई उड़ान भरता।
श्रृंगारित मधुवन यौवन में-
युवावेश की प्रचण्ड पुकार
घन-तिमिर का करूँ संहार,
कायात्मा की एक ही पुकार,
जीवन ओढ़े बलिदानी संस्कार,
अंतस में मातृ-भूमि का सरोकार,
तेरे लिए ही हो मेरे रक्त की फुहार।
युवावस्था के प्रौढ़पन में-
रग-रग में वीरत्व की ंलार
भुजाओं में राष्ट्र रक्षा का भार
अंतस में राष्ट्र-प्रेम की धार,
सीमा पर रण-भेरी संग प्रहार
युवावेश की प्रचण्ड पुकार,
शत्रुओं का करूँ संहार,
सीमान्त भारत मेरे जीवन का अंतिम सोपान,
जहाँ क्षण-क्षण गतिशील हो, होना है बलिदान।

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