मेरी कविताएं

शब्दों का ताना-बाना

निर्मल झरना जैसा बहता बालपन

निर्मल झरना जैसा बहता बालपन,
कोमल तन में ठहरता अबोध मन,
उड़ान भरता निर्भय मधुर बालपन,
रंग-विरंगे पंख पकड़ता हर्षित मन,
थोड़ा बहुत हाथ-पैर चलाने का प्रयास,
तितलियों संग उड़ान भरने का उल्लास,
अधीरता को पकड़े अनचाहा लड़कपन
स्वयं सें कुछ विचारने लगा अक्रांत-मन,
उलझनों में सिंहरने लगा मेरा तन-मन
आया चंचलता का सुकुमार किशोरपन,
विचारों में देश-समाज की आँच,
प्रेरित युवा-जीवन की राह साँच,
श्रृंगारित मधुवन यौवन की सांझ,
यौवन का जीवन चमकीला कांच,
हवाओं में जीवन-क्रांति का शोर,
पग-पग पर मन नाचे जैसे मोर,
कस्तूरी मृग जैसे ढूँढे चित-चोर,
उमड़ते प्रश्नों की वर्षा घन-घोर
मुझे ले गया देश सेवा की ओर,
कायात्मा की हुई सुनहरी भोर,
मन के पतंग की सुलझी डोर,
जीवन पथ पर नित नवल होर,
बलिदान आत्मा का दूसरा छोर
भारत-भूमि का नेक दिन,
बलिदान होना है एक दिन,
रग-रग में वीरत्व की धड़कन,
भुजाओं में उत्साही फड़कन,
वक्षस्थल में अधीर कसावट,
कर्ण में रणभेरी की घनघनाहट,
पग-पग में मैराथन की आहट,
काल के भाल में रण की सजावट
दिनचर्या अब वीरत्व का सुपाठ,
रण और प्राण जीवन के दु पाट
सीमाओं में तार-बाड़ का जाल,
वीरत्व हेतु अमरत्व का ताल,
बलिदान होना है हिंद के लाल।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *